श्रीगंगानगर: राजस्थान के किसान नेता हेतराम बेनीवाल का 94 वर्ष की उम्र में निधन
Sriganganagar: Rajasthan farmer leader
श्रीगंगानगर: राजस्थान की राजनीति में जब भी 'लाल झंडे' और किसान संघर्षों का इतिहास लिखा जाएगा, उसमें माकपा के कद्दावर नेता हेतराम बेनीवाल का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगा। 94 वर्ष की आयु में सोमवार रात उनका निधन न केवल एक पूर्व विधायक का जाना है, बल्कि राजस्थान के आंदोलनों के एक जीवंत अध्याय का समाप्त होना है।
13 अक्टूबर 1932 से 2026: एक अजेय सफर
हेतराम बेनीवाल का जन्म 13 अक्टूबर 1932 को हुआ था। उन्होंने उस दौर में वामपंथी विचारधारा को चुना, जब राजस्थान की राजनीति में रजवाड़ों और रसूखदारों का बोलबाला था। 1967 में उन्होंने संगरिया विधानसभा क्षेत्र से माकपा के टिकट पर अपनी पहली चुनावी पारी शुरू की। हालांकि, उन्हें असली पहचान 1990-91 में मिली जब वे संगरिया से विधायक चुने गए। भले ही विधानसभा भंग होने के कारण उनका कार्यकाल ढाई वर्ष का रहा, लेकिन उन 30 महीनों में उन्होंने सदन के भीतर अपनी जो छाप छोड़ी, उसकी चर्चा आज भी पुराने नेता करते हैं।
बिना माइक के गरजने वाली 'आवाज'
बेनीवाल की सबसे बड़ी शक्ति उनकी आवाज और उनकी सादगी थी। पुराने कार्यकर्ता बताते हैं कि कॉमरेड बेनीवाल की आवाज इतनी बुलंद थी कि उन्हें हजारों की भीड़ को संबोधित करने के लिए किसी लाउडस्पीकर या माइक की जरूरत नहीं पड़ती थी। वे घंटों तक अपनी तीखी वाणी और चुटीले अंदाज से प्रशासन की चूलें हिला देते थे। विधानसभा का एक वाकया उनकी दबंगई को बखूबी दर्शाता है। एक बार सदन में भारी शोरगुल के बीच उन्होंने तत्कालीन अध्यक्ष हरिशंकर भाभड़ा से दो टूक कहा कि पहले इन्हें चुप कराइए, तब बोलूंगा। इस पर अध्यक्ष ने मुस्कुराते हुए कहा था कि आप अपने स्वभाव में बोलिए, ये खुद चुप हो जाएंगे।
आंदोलनों के 'मसीहा' और रणनीतिकार
हेतराम बेनीवाल केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े रणनीतिकार थे। उन्होंने राजस्थान में कई ऐतिहासिक आंदोलनों का नेतृत्व किया।
- घड़साना किसान आंदोलन (2004-06): पानी की मांग को लेकर हुए इस भीषण आंदोलन में उन्होंने किसानों को एकजुट रखने के लिए गांव-गांव जाकर शपथ दिलाई।
- जमीन आवंटन और मजदूर संघर्ष: राजस्थान कैनाल जमीन आवंटन हो या जेसीटी मिल मजदूर आंदोलन, बेनीवाल हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहे।
- भाखड़ा और गंगनहर: सिंचाई पानी के अधिकारों के लिए उन्होंने कई बार जेल यात्राएं कीं और लाठियां खाईं।
उनकी संगठन क्षमता ऐसी थी कि जब वे किसी प्रदर्शन का आह्वान करते, तो प्रशासन पहले ही अलर्ट मोड पर आ जाता था। उन्हें पता था कि बेनीवाल की एक आवाज पर हजारों किसान सड़कों पर उतरने का दम रखते हैं।
सादगी और स्पष्टवादिता का अंत
पिछले वर्ष उनकी पत्नी चंद्रावली देवी का निधन हुआ था, जिसके बाद वे थोड़े एकाकी हो गए थे। लेकिन 94 साल की उम्र में भी उनका हौसला कम नहीं हुआ। तीन दिन पहले हीमोग्लोबिन की कमी के कारण वे अस्पताल में भर्ती हुए, लेकिन निमोनिया के संक्रमण ने इस 'जनता के सिपाही' को हमसे छीन लिया। मंगलवार को उनके पैतृक गांव 8 एलएनपी में जब उनकी अंतिम यात्रा निकलेगी, तो वहां केवल उनके परिजन नहीं, बल्कि राजस्थान का वो हर किसान और मजदूर खड़ा होगा जिसे उन्होंने लड़ना सिखाया।